व्यभिचारिन पड़ोसन धमाल कर गयी ,,,,
राह चलते मुसाफिर को बीमार कर गयी ,,
सोच कर गर कदम ठहरी होती पड़ोसन ,,,
मुसाफिर भी मिलते, न इतने सितमगर
बेजानों से दिल की दुआ कर रही है ,,
व्यभिचारिन पड़ोसन शरम कर रही है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बेजानों की दुनिया मुहब्बत की आशा ,
तोहमत भरी जिंदगी का निराशा ,,
चाहत पर ऐसा करम कर गई है ,,
मासूक जिंदगी मे कहर ढा गयी है ,,,,
व्यभिचारिन पड़ोसन शरम कर रही है,,
===================
सोच कर गर सितम,
आंसू बहते हैं उनके ,,,
ज़ख्मों के उनके दवा क्या करोगे ?
बेजानों से दिल की दुआ कर रही है ,,
व्यभिचारिन पड़ोसन शरम कर रही है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें