बुधवार, 20 नवंबर 2013

मानव लिप्सा झंकृत करती ,

जंगलों   का    है  दृश्य   मनोरम ,,
जंगली   जीव    रहा   करते ,,
जब    से   मानव    जंगल  काटे ,
शहरों   में  मंगल  किया   करते  हैं ,,
मानव   लिप्सा  झंकृत  करती ,
आलंकृत   उन   श्रृंगारों   को ,
कुर्बान   करे    निज   चाहत  में ,
 कानन  के    श्रृंगारों    को ,
मौन    सहे   कब   तक    ये   जंगल  ,,,
मानव    के   निज    मंगल   को ,
मानव   लिप्सा   झंकृत   करती
आलंकृत   उन   श्रृंगारों    को ,,,,




बढ़   जाती   है  ख्वाविस    उनकीं ,
नवजीवन   प्रेम     तरंगों    में ,,,
प्रेम  में    प्रेम  को  लूट    रहें  है ,,
सावन   मास   फुहारों   में ,,
मानव   लिप्सा   झंकृत   करती ,
 आलंकृत   उन   श्रृंगारों  को
राजकिशोर    मिश्रा  २० /१ १ /२ ० १ ३ 

रविवार, 17 नवंबर 2013

उल्लू और हंस दुनिया के संग

वक्त की बदलती हुई नजाकत को नजर अंदाज करना ना आदर्शवाद है ना प्रकृतिवाद, बल्कि मानव मन की कुंठा है। जो दास बना दिया है, उल्लू पर विराजमान श्री का उल्लू, हंसवाहिनी मां शारदा का पुजारी, कभी-कभी उल्लुओं से मात खा जाता है जिन्हें शुद्ध बोलना बोलने की शैली भी नही सीखी है। जिन्हें आप सामान्य भाषा मे मूर्ख और जाहिल भी कह सकते हैं। कौवे की तरह कांव-कांव करना जिनको विरासत में प्राप्त हुआ है। कोयल की मधुर बोली की झंकार भी कौवे की कांव-कांव में दब जाती है। यह विधाता का कैसा फरमान है? अवगुनी गुणी को शिक्षा देता है।

झूठ फरेब के पिलर [खंब] पर बनी हुई इमारत का अस्तित्व क्या, बालू से बनी हुई इमारत की बिसात क्या... फिर भी अहंकारी नाग सा मदान्ध मूर्ख को ज्ञान कहाँ.., उसका अस्तित्व उस पिलर में ही निहित है। संस्कार उसके कार में दब जाते हैं। संस्कार विहीन कार इंजन अज्ञान रूपी तिमिरंध मे भटक जाता है। जिसका कोई उद्देश्य नहीं होता, उद्देश्य विहीन स्वार्थी और लालची व्यक्ति से सुख कोसों दूर भाग जाता

उड़ जा रे दुख के तू पंछी..
आज बहेलिया जाल बिछाया..
जिसको तूने अपना समझा..
वही हुआ है पराया..
उड़ जा रे दुख के तू पंछी
यह शहर हुआ बेगाना..
नहीं है नेकी अब अफ़साना..
कितना कोई कोमल दिल हो..
अब नहीं नेक जमाना..
बहुरिया बदल ले अब तू ठिकाना..
बहुरिया अब नहीं नेक जमाना..
बन के बहेलिया चारा डाले..
करता नित नव फसाना..
बहुरिया बदल गया अब जमाना
सेवक स ठ नृप कृपन कुनारी..
कपटी मित्र सूल सम चारी.. [रामचरित मानस 6/9]
सचिव बैद गुरु तीन जौं, प्रिय बोलहिं भय आस..
राज धर्म तन तीनकर, होइ बेग़ही नाश.. [सुंदरकांड दोहा/37]
चाटुकारों से भरी धरती, नया पैगाम लाती है..
फतह होगा क़िला यह भी, नया संदेश सुनाती है..
दिखे वह पंच तारे भी, सितारें गर हों गर्दिश में,
कहूँ क्या बात सिंहों [शेर] की, सियारों से तबाही है.. [राधेश्याम तर्ज]
rajkishor   mishra 

बाळ दिवस

रात और दिन का अंतर भी , नहीं जानते बच्चें ए ,,

आजादी स्वप्न उन्हे लगता,जैसे -

पिजड़ें मे कैद हुआ पनछी,,

क्या जाने सुख की साँसों को,

रुसवाई जिसने है देखी ,,

करें कल्पना सावन की,

जेठ की तपती धूपों मे ,,,

पदत्राण सहे रवि ग्रीष्म ,

तपित धरती संग ,,

चिंटू -मिंटू की देखि दशा ,

विह्वल धरती यह सोच  रही है  ,

आज का बालक कल का निर्माता ,

कैसे बनेगा भाग्य बिधाता ,,,

मालिक के मालिकानें मे भूखे बच्चे सब सोय रहें है ,,

सरकार बाळ श्रमिक उन्मूलन नित कानून बनाती है ,,

पर वह कागज तक सीमित रहते बच्चों को सदा रुलाती ,

महरूम हैं शिक्षा से बच्चें,

नित करें ग़ुलामी मलिक की ,,

रूखी -सुखी रोटी कितनी तड़पाती है इन बच्चों को ,,,,

वसनहीन बाळ हैं बेकरार रोटियों से ,,,

ग्रीष्म ,शीत और बरसात , काली नित घनघोरी रात ,,

मालिक की आवाजों मे , आफत की होती है बरसात ,

क्या जाने बाळ है बाळ दिवस , हर दिन बीते काल दिवस ,

,आडंबर करती सरकारें , बालक क्या जाने बॉलदिवस

राजकिशोर मिश्रा 14/11/2013 

बुधवार, 6 नवंबर 2013

उल्लू और हंस दुनिया के संग

वक्त की बदलती हुई नजाकत को नजर अंदाज करना ना आदर्शवाद है ना प्रकृतिवाद, बल्कि मानव मन की कुंठा है। जो दास बना दिया है, उल्लू पर विराजमान श्री का उल्लू, हंसवाहिनी मां शारदा का पुजारी, कभी-कभी उल्लुओं से मात खा जाता है जिन्हें शुद्ध बोलना बोलने की शैली भी नही सीखी है। जिन्हें आप सामान्य भाषा मे मूर्ख और जाहिल भी कह सकते हैं। कौवे की तरह कांव-कांव करना जिनको विरासत में प्राप्त हुआ है। कोयल की मधुर बोली की झंकार भी कौवे की कांव-कांव में दब जाती है। यह विधाता का कैसा फरमान है? अवगुनी गुणी को शिक्षा देता है।

झूठ फरेब के पिलर [खंब] पर बनी हुई इमारत का अस्तित्व क्या, बालू से बनी हुई इमारत की बिसात क्या... फिर भी अहंकारी नाग सा मदान्ध मूर्ख को ज्ञान कहाँ.., उसका अस्तित्व उस पिलर में ही निहित है। संस्कार उसके कार में दब जाते हैं। संस्कार विहीन कार इंजन अज्ञान रूपी तिमिरंध मे भटक जाता है। जिसका कोई उद्देश्य नहीं होता, उद्देश्य विहीन स्वार्थी और लालची व्यक्ति से सुख कोसों दूर भाग जाता

उड़ जा रे दुख के तू पंछी..
आज बहेलिया जाल बिछाया..
जिसको तूने अपना समझा..
वही हुआ है पराया..
उड़ जा रे दुख के तू पंछी
यह शहर हुआ बेगाना..
नहीं है नेकी अब अफ़साना..
कितना कोई कोमल दिल हो..
अब नहीं नेक जमाना..
बहुरिया बदल ले अब तू ठिकाना..
बहुरिया अब नहीं नेक जमाना..
बन के बहेलिया चारा डाले..
करता नित नव फसाना..
बहुरिया बदल गया अब जमाना
सेवक स ठ नृप कृपन कुनारी..
कपटी मित्र सूल सम चारी.. [रामचरित मानस 6/9]
सचिव बैद गुरु तीन जौं, प्रिय बोलहिं भय आस..
राज धर्म तन तीनकर, होइ बेग़ही नाश.. [सुंदरकांड दोहा/37]
चाटुकारों से भरी धरती, नया पैगाम लाती है..
फतह होगा क़िला यह भी, नया संदेश सुनाती है..
दिखे वह पंच तारे भी, सितारें गर हों गर्दिश में,
कहूँ क्या बात सिंहों [शेर] की, सियारों से तबाही है.. [राधेश्याम तर्ज]

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

दीपावली

दीपावली  जन -जन  के   जीवन  मे   उत्साह  ,उमंग , प्रकाश ,   समृद्धि  और  आरोग्यता  का   प्रतीक   बने ,,,  तिमिरंध  विनाशक , ज्ञान   प्रकाशक  दीप की   लड़ियाँ  आपके   जीवन  को  नवीन आभा   से   प्रकाशित   करें ,,,, दीपावली स्वच्छ्ता का प्रतीक और सभी धर्मों का त्योहार है ,,,,
1- हिन्दू  धर्मशास्त्रों के अनुसार - भगवान राम की लंका पर विजयोपरांत अयोध्या आने की खुशी मे दीप जलाये ,,,
2-  कृष्ण भक्तिधारा से जुड़े लोग पृथ्वी पुत्र नरकासुर [भौमासुर] के अत्याचार देव से मनुष्य तक त्रस्त थे देव माता आदिती का कुंडल छीन लिया था ,, 16100/ राजकन्याओं को बंदी बना कर रखा था ,,, चतुर्दशी के दिन सत्यभामा के सहयोग से महा आततायी दैत्य से मुक्ति दिलाई , अगले दिन कृष्ण के गोकुल आने पर गोकुल वासियों ने घी के दीये जलाये ,,,, 3=      महर्षि दयानंद का जन्म और महाप्रयाण दीपावली के दिन था मा गंगा के पावन तट पर समाधि ली ,,,,आर्य समाज के संस्थापक थे ,,,
 4-जैन धर्म के चौबीसवे तीर्थकर महावीर स्वामी निर्वाण दिवस दीपावली के दिन है ,,,,
5= सिक्खों के पवित्र गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास भी दीपावली के दिन हुआ है ,,,,,दिवाली के दिन छठें गुरु हरगोविन्द सिंह जेल से रिहा हुए थे ,,
दीपावली के दिन लक्ष्मी और गणेश का पूजन किया जाता है ,,,, घर मे सुन्दर -सुन्दर रंगोली बनाई जाती है ,, पकवानो की तो बात ही निराली,,,,,, जिसको जो मन आया वही बना कर खाया ,,,,,,
  दीपावली   धनतेरस   से  लेकर  दीपावली के   दो  दिन  बाद  भाई  दूज  तक मनाया   जाता है ,,,दीपावली के पूर्व अपने घरों की सॉफ सफाई और रंग रोगन करने लगते हैं ,,, वैसे भी बरसात के बाद घर की सफाई रंग -रोगन आवश्यक हो जाता है ,,,,/ दीपावली के पूर्व बाजार की रौनक ही बदल जाती ,,, भारतीय और चाईना की रंग -विरंगी झालर दियली झूमर पटाके आतिश बाजार मे चार -चांद लगा देते हैं ,,,,मिठाई की दुकानों की रौनक बदल जाती है , ड्राय फ्रूट बाजारी चमक धमक महा नगरों मनोरम रम्यता स्वतः आकर्षित कर लेती है ,,,, धन तेरस के दिन सोने -चांदी के आभूषण ग्राहक आकर्षण के केन्द्र बने रहते हैं ,,,, बर्तन की दुकानदारों और धनतेरस को मानने वालों के विशेष होता है ,, लोग इस दिन बर्तनों की भी खरीददारी करते हैं ,,,,,                               दीपावली सुख समृद्धि आरोग्यता , और खुशियों का त्योहार है ,,,, हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अनुसार दीपावली वैश्यों [धनिक , व्यापारियों ] का त्योहार है ,,,, भगवान राम द्वारा लंका विजयोपरांत अयोध्या आगमन की खुशी मे दीप जलाये ,,,,पौराणिक कथा के अनुसार देवता और दैत्यों ने मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बना कर समुद्र मंथन किया जिससे चौदह रत्न====
=हलाहल विष हरे भोले ,,
लक्ष्मी विष्णु संग डोले ,,
हलाहल विष हरे भोले ,,,,
कामधेनु और रम्भा ,
वारुणी ,पारिजात है
देवराज के गज को देखो है ऐरावत नाम , 
दैत्यराज बालि तुरंग [अश्व]उच्चाश्रवा हुआ तब नाम  ,
रजनी पति का सागर उद्गार हुआ ,
, पंचजन्य शंख की ध्वनि जब गुज़ें,
आह्लादित संसार हुआ ,
, धनवंतरि सा वैद भी
निकला लेकर अमृत रस
,,हलाहल विष पीये भोले,,
असतो मा सद्गमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय  दीपावली   धनतेरस   से  लेकर  दीपावली के   दो  दिन  बाद  भाई  दूज  तक मनाया   जाता है ,,,दीपावली के पूर्व अपने घरों की सॉफ सफाई और रंग रोगन करने लगते हैं ,,, वैसे भी बरसात के बाद घर की सफाई रंग -रोगन आवश्यक हो जाता है ,,,,/ दीपावली के पूर्व बाजार की रौनक ही बदल जाती ,,, भारतीय और चाईना की रंग -विरंगी झालर दियली झूमर पटाके आतिश बाजार मे चार -चांद लगा देते हैं ,,,,मिठाई की दुकानों की रौनक बदल जाती है , ड्राय फ्रूट बाजारी चमक धमक महा नगरों मनोरम रम्यता स्वतः आकर्षित कर लेती है ,,,, धन तेरस के दिन सोने -चांदी के आभूषण ग्राहक आकर्षण के केन्द्र बने रहते हैं ,,,, बर्तन की दुकानदारों और धनतेरस को मानने वालों के विशेष होता है ,, लोग इस दिन बर्तनों की भी खरीददारी करते हैं ,,,,,                               दीपावली सुख समृद्धि आरोग्यता , और खुशियों का त्योहार है ,,,, हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अनुसार दीपावली वैश्यों [धनिक , व्यापारियों ] का त्योहार है ,,,, भगवान राम द्वारा लंका विजयोपरांत अयोध्या आगमन की खुशी मे दीप जलाये ,,,,पौराणिक कथा के अनुसार देवता और दैत्यों ने मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बना कर समुद्र मंथन किया जिससे चौदह रत्न====
=हलाहल विष हरे भोले ,,
लक्ष्मी विष्णु संग डोले ,,
हलाहल विष हरे भोले ,,,,
कामधेनु और रम्भा ,
वारुणी ,पारिजात है
देवराज के गज को देखो है ऐरावत नाम , 
दैत्यराज बालि तुरंग [अश्व]उच्चाश्रवा हुआ तब नाम  ,
रजनी पति का सागर उद्गार हुआ ,
, पंचजन्य शंख की ध्वनि जब गुज़ें,
आह्लादित संसार हुआ ,
, धनवंतरि सा वैद भी
निकला लेकर अमृत रस
,,हलाहल विष पीये भोले,,
असतो मा सद्गमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय
दीपावली की सार्थकता तभी संभव है , जब जन -जन अंधकार से प्रकाश मय हो जाये , ग्यान के दीप की प्रकाश लालिमा सारा जहां सारोबार हो जाये ,,, चिराग तले अधेरा सिर्फ एक कहावत बन कर रह जाये ,,,, कवि ने बड़े मार्मिक शब्द मे लिखा है=
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना ,,,
अंधेरा धरा पर कंही रह ना जाये,,,,