रविवार, 17 नवंबर 2013

बाळ दिवस

रात और दिन का अंतर भी , नहीं जानते बच्चें ए ,,

आजादी स्वप्न उन्हे लगता,जैसे -

पिजड़ें मे कैद हुआ पनछी,,

क्या जाने सुख की साँसों को,

रुसवाई जिसने है देखी ,,

करें कल्पना सावन की,

जेठ की तपती धूपों मे ,,,

पदत्राण सहे रवि ग्रीष्म ,

तपित धरती संग ,,

चिंटू -मिंटू की देखि दशा ,

विह्वल धरती यह सोच  रही है  ,

आज का बालक कल का निर्माता ,

कैसे बनेगा भाग्य बिधाता ,,,

मालिक के मालिकानें मे भूखे बच्चे सब सोय रहें है ,,

सरकार बाळ श्रमिक उन्मूलन नित कानून बनाती है ,,

पर वह कागज तक सीमित रहते बच्चों को सदा रुलाती ,

महरूम हैं शिक्षा से बच्चें,

नित करें ग़ुलामी मलिक की ,,

रूखी -सुखी रोटी कितनी तड़पाती है इन बच्चों को ,,,,

वसनहीन बाळ हैं बेकरार रोटियों से ,,,

ग्रीष्म ,शीत और बरसात , काली नित घनघोरी रात ,,

मालिक की आवाजों मे , आफत की होती है बरसात ,

क्या जाने बाळ है बाळ दिवस , हर दिन बीते काल दिवस ,

,आडंबर करती सरकारें , बालक क्या जाने बॉलदिवस

राजकिशोर मिश्रा 14/11/2013 

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