गुरुवार, 19 सितंबर 2013

व्यभिचारिन पड़ोसन धमाल कर गयी ,,,,



व्यभिचारिन पड़ोसन धमाल कर गयी ,,,,

राह चलते मुसाफिर को बीमार कर गयी ,,

सोच कर गर कदम ठहरी होती पड़ोसन ,,,

मुसाफिर भी मिलते, न इतने सितमगर

बेजानों से दिल की दुआ कर रही है ,,

व्यभिचारिन पड़ोसन शरम कर रही है

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बेजानों की दुनिया मुहब्बत की आशा ,

तोहमत भरी जिंदगी का निराशा ,,

चाहत पर ऐसा करम कर गई है ,,

मासूक जिंदगी  मे कहर ढा    गयी है ,,,,

व्यभिचारिन पड़ोसन शरम कर रही है,,

===================

सोच  कर  गर  सितम,

 आंसू  बहते हैं  उनके ,,,

ज़ख्मों के उनके दवा क्या करोगे  ?

बेजानों से दिल की दुआ कर रही है ,,

व्यभिचारिन पड़ोसन शरम कर रही है


 

 



गुरुवार, 12 सितंबर 2013

मजहब के नाम पर कितना वोट लोगे ,,

मजहब के नाम पर कितना वोट लोगे ,,
, अपने जमीर से पूछों खुद को कितना नोच लोगे ,,
, धर्म और जाति को बदनाम न करो
जिस माँ के गर्भ मे पले उसे तवाह न करो ,,,,
मजहब के नाम पर कितना वोट लोगे ,,,
जिस माँ के सिंदूरों की लाली ,,
मिट जाती तेरे वोटों से ,,
क्या जाकर दोगे तुम जबाब ,
 मिट  जाता  उनके ख्वाबों का आफताब ,,
ममता की आँचल का चिराग ,
मानवता करती नित विलाप ,
क्रन्दन करता है आफताब ,,,
बुझ जाता माँ के आंचल का चिराग ,,
 व़हाँ जाकर दोगे क्या जबाब ,,,,
कितना हलाहल भर दोगे,
अपने पराये आंचल मे ,,,
मानवता का त्राहि -त्राहि होता है तेरे आँगन मे ,,
कितनी विषधर है राजनीति ,, उससे विषधर है राजदंड,,
मजहब के नाम पर कितना वोट लोगे ,,,
फिरंगियों की तरह देश को बर्बाद ना करो ,,
मजहब के नाम पर कितना वार करोगे ,,
भाईचारे को कितना नीलाम करोगे ,,,,
मजहब के नाम पर कितना वोट लोगे ,,,,,,,,,,

अपनी माँ के आंचल कितना दाग भरोगे ,,,
मजहब के नाम पर कितना वोट लोगे ,,,,,,,,,,

अपनी माँ के आंचल में  कितना दाग भरोगे ,,,

ए राजनीति के मुसाफिर सोच लीजिये ,,

मजहब के नाम पर न धमाल कीजिये ,,,

खुद जीओ और दूसरे को जीने एहसान कीजिये

जो दे रहे हो दर्द उसका एहसास कीजिये ,,

रविवार, 8 सितंबर 2013

प्रजातंत्र की कलमी डाल ,,,,


प्रजातंत्र  की  कलमी   डाल ,,,,
 लुटे  खाएं  रहें आबाद
प्रजातन्त्र  की  कलमी  डाल ,,,
 डाल  - डाल पर  कोटि   घोसला ,,
 बिनु  मालिक  का   रचे   चोचला ,,,
प्रजातंत्र  की  कलमी  डाल ,,,,
नाम  से एन  कर   समझा  हाल ,,,,
लूट -खसोट  करें  नित  चर्चा ,,
वाह  प्रजातंत्र  की  कलमी  डाल ,,,
 जनता  इनसे  है  बेहाल ,,,,
प्रजातंत्र की  कलमी डाल ,

नोट  वोट  से  नेता  बनते ,,
जन -जन  को  धीरे   से   ठगते ,,,,
वाह   राजनीति   की  कलमी   डाल ,,
प्रजातंत्र  की  जनता   कैसी ,,
सावन  -भादों  की   वर्षा   जैसी ,,,,
प्रजातंत्र  की  कलमी  डाल ,,,,

नरक लोक मे तरकारी [व्यंग ]

नरक  लोक  में   भा  सम्मलेन ,
चर्चा  भई   तरकारी
आलू  और  टमाटर   टिंडा ,
बैगन  और   करेला    भिंडा ,,,
 परवर  ,मटर  पटल   सब  बैठे ,,,
नरक  लोक  में  भा   सम्मलेन
बैठे  सब   तरकारी ,,,,,,,
गाजर  मूली  और   चुकन्दर ,
पालक   मेथी  गोभी  अंदर ,,,
नेनुआ  और   तारोई   बोले ,,,,
काकर  खीरा  का  मन  डोले ,,,,
शिमला   सेम  अलग  ही  बैठे ,,,
मिर्ची  कुछ  तीखा ही    बोले ,,
कोहड़ा  , लौकी   कटहल  ठनके ,
चौराई  निकली   बन  ठन  के ,,,,
 केला  और   पपीता   दिखले ,,
 लहसुन  और  ,प्याज   भी  बैठे ,,,
अगले -बगले  आसन ,,,,
सुरन  औ   मशरूम   भी   आये ,,,
उनकर   नेक  इरादा ,,,,
 तन  करके  कादा [प्याज] जी ,
बोले ,,
हम  हैं  सब  के   राजा ,,
मान  लो  हमारी  बात ,,
  बहुत     दिन   देहा  तू  झांसा ,,
कांदा  का  तेवर  देख  कर  उठले ,,,
तभी  बटाटा [आलू ] दादा ,,
शान्त  हो   जाओ  प्याज  राज
 अब  तुम्हीं   बनोगें   राजा ,,,,,
नरक  लोक  में  हुई   तब  चर्चा ,,,
आज  से  कांदा   राजा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,