बुधवार, 20 नवंबर 2013

मानव लिप्सा झंकृत करती ,

जंगलों   का    है  दृश्य   मनोरम ,,
जंगली   जीव    रहा   करते ,,
जब    से   मानव    जंगल  काटे ,
शहरों   में  मंगल  किया   करते  हैं ,,
मानव   लिप्सा  झंकृत  करती ,
आलंकृत   उन   श्रृंगारों   को ,
कुर्बान   करे    निज   चाहत  में ,
 कानन  के    श्रृंगारों    को ,
मौन    सहे   कब   तक    ये   जंगल  ,,,
मानव    के   निज    मंगल   को ,
मानव   लिप्सा   झंकृत   करती
आलंकृत   उन   श्रृंगारों    को ,,,,




बढ़   जाती   है  ख्वाविस    उनकीं ,
नवजीवन   प्रेम     तरंगों    में ,,,
प्रेम  में    प्रेम  को  लूट    रहें  है ,,
सावन   मास   फुहारों   में ,,
मानव   लिप्सा   झंकृत   करती ,
 आलंकृत   उन   श्रृंगारों  को
राजकिशोर    मिश्रा  २० /१ १ /२ ० १ ३ 

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