सोमवार, 5 अगस्त 2013

हे सावन तुम कब आओगे ,

रिमझिम -रिमझिम  वारि  की धारा ,,
तन-मन  पुलकित  वारि  है  न्यारा ,,,
मन मयूर  पुलकित  कर  गुंजन ,
वारि  विमल  धारा  सम  संगम ,,,
पावस   ऋतु  आगमन  सुहावन ,
मानव  मन  हिय  अति  मनभावन ,,
ग्रीष्म  तपित धरती  कर  क्रन्दन ,
कब  आओगे  ग्रीष्म  निकंदन ,
  तुम  बिनु  धरती  व्यथित   है  कैसी ,,
जल बिनु  मीन  व्यथा  है  जैसी ,,
अद्रा नखत  पुनीत  सुहावा ,,
मेघ  वारि  घनघोरहि आवा ,,
जल  सम सृष्टि  विलय  
होजैसे ,
 जल बिनु   जड ,चेतन  गति  वैसे ,,
नीर परम् वह  तत्व  अनूपा ,
जड ,चेतन , सद्गति  जलरूपा ,,
सावन्  मास पुनीत  सुहावा ,,
श्रावण मास शिव  के  मन भावा ,,
बोल बम का  गुंजन  होवे ,
शिव महिमा जन -जन को मोहे 
बोल  बम का  गुंजन  होये ,
मोर  मयूर  मन  नाचन  लागे ,
पिक,  कोयल  दादुर की  बोली ,,,
हरियाली  मय   धरती  बोली ,,
तू  है  मेरे  दिल  का  ताज ,,
हे  सावन  तुम पर  है नाज ,,,,
हे  सावन  तुम पर  है नाज ,,,,
हे सावन  तुम  कब  आओगे ,
मन  का  भाव  जगा  जाओगे 
हे सावन  तुम  कब  आओगे 

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